क्या बताऊं, अपने इस ब्लॉग पर मैंने शुरुआत कविता से की लेकिन क्या मालूम था कि लोग इतने निष्ठुर निकलेंगे। बताइए, कविता में एक सहज शारीरिक क्रिया 'पादना' का मैंने राजनीतिक प्रयोग किया और रतलाम से लेकर दिल्ली तक लोग उसे ही पकड़ सके। भाई, ठीक है कि कवि आउटडेटेड हो चुका है, इसका मतलब ये तो नहीं कि उसकी बेइज्जती की जाए।
अब समझ नहीं आ रहा है कि क्या लिखूं। इतने अच्छे माध्यम को लोगों ने एक-दूसरे की लड़ाई का मंच बना लिया है। आज ही मैंने अविनाश जी के ब्लॉग पर एक टिप्पणी की और उन्होंने पूरा फासिस्ट रवैया अपनाते हुए मेरा मुह नोच लिया, मुद्दे को टाल गए।
सोच रहा हूं, कि क्या किया जाए। रवि रतलामी भी रचनाकार पर तमाम साहित्य लिखते हैं, लेकिन उनका भी रवैया वैसा ही रहा। भाषा और शैली से लोग आगे बढ़ कर कविता का अर्थ समझते ही नहीं हैं।
सिर्फ एक जानकारी देना चाहूंगा...ब्रेख्त ने अपनी एक कविता में 'पादने' का प्रयोग किया है...क्या उनके बारे में भी अविनाश और रवि रतलामी का यही ख्याल होगा जो उन्होंने मेरे बारे में जाहिर किया है। पता नहीं, ब्लॉग के प्रसिद्ध लोगों ने ब्रेख्त को पढ़ा भी है नहीं या मैं ही ऐसा उदाहरण देकर खुश हो जा रहा हूं...बहुत निराशा हुई भाई लोगों आपकी दुनिया से...सोचा था कि कुछ असंपादित चीज़ें लिख पढ़ कर सुख उठाएंगे लेकिन यहां भी चैन नहीं...
21.3.07
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